प्रयागराज (उत्तर प्रदेश): माघ मेला 2026 में सनातन धर्म के सबसे पवित्र समय मौनी अमावस्या के अवसर पर गंगा-यमुना संगम पर डुबकी लगाने जाने को लेकर बड़ा विवाद उभर उठा है। इस विवाद का केंद्र बने हैं ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, जिनके और मेला प्रशासन के बीच पिछले कुछ दिनों से टकराव जारी है। इस विवाद ने धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर व्यापक प्रतिक्रिया को जन्म दिया है।
🔹 क्या है विवाद की शुरुआत ?
माघ मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को उनके स्वयं घोषित ‘शंकराचार्य’ उपाधि के प्रयोग को लेकर आधिकारिक नोटिस जारी किया। प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के 2022 के एक आदेश का हवाला देते हुए उनसे 24 घंटे में स्पष्टीकरण मांगा कि वह किस कानूनी आधार पर अपने आप को ‘शंकराचार्य’ घोषित कर रहे हैं, जबकि संबंधित न्यायिक प्रक्रिया अभी भी लंबित है।
प्रशासन का कहना है कि यह कदम सुप्रीम कोर्ट की अवमानना रोकने और कानूनी आदेशों के पालन के उद्देश्य से लिया गया है, न कि किसी संत का अपमान करने के लिए।
🔹 मौनी अमावस्या स्नान और रोक: क्या हुआ था?
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का दावा है कि उन्हें मौनी अमावस्या के दौरान संगम में डुबकी लगाने से रोका गया, जिससे घटनास्थल पर उनके अनुयायियों और प्रशासन के बीच तनाव बढ़ गया। समर्थकों का कहना है कि प्रशासन ने उनके साथ अन्याय और असम्मानपूर्ण व्यवहार किया है।
कुछ रिपोर्टों के अनुसार जब शिविर से संगम की ओर जाने की कोशिश की गई, तो पुलिस और अनुयायियों के बीच धक्का-मुक्की भी हुई, और यह मामला मीडिया में तेजी से फैल गया।
🔹 हंगामा और सुरक्षा की स्थिति
घटना के बाद अविमुक्तेश्वरानंद के शिविर के आसपास सुरक्षा बढ़ा दी गई। पुलिस ने कहा कि कुछ समूहों ने शिविर में घुसने का प्रयास किया, जिससे सीनियर अधिकारियों के नेतृत्व में स्थिति को नियंत्रित किया गया।
विशेष रूप से कुछ युवा ‘योगी जिंदाबाद’ के नारे लगाते हुए शिविर में हंगामा कर चुके हैं, जिसका शूट CCTV में कैद भी किया गया।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के अनुयायियों ने यह भी कहा कि शिविर के आसपास CCTV कैमरों को एहतियात के तौर पर लगाया गया, ताकि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
🔹 शंकराचार्य का विरोध जारी — हत्या की आशंका भी जताई
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने यह भी कहा है कि वे अपनी मांगों के पूरा होने तक माघ मेला स्थल नहीं छोड़ेंगे और यहां तक कि उन्होंने अपनी हत्या की आशंका भी जताई है। उनका कहना है कि अगर प्रशासन ने स्थिति को सही ढंग से संभाला होता, तो यह विवाद इस स्तर तक नहीं पहुंचता।
उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई अधिकारी अपनी गलती स्वीकार करता, तो मामला जल्द सुलझ सकता था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
🔹 राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएँ
यह विवाद केवल धार्मिक या प्रशासनिक नहीं रहा — यह राजनीति के केंद्र में भी आ चुका है।
🔸 पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने प्रशासन की आलोचना करते हुए कहा कि शंकराचार्य का समर्थन करना सनातन धर्म की मर्यादा बनाए रखने का कार्य है और उनसे सबूत मांगना गलत है।
🔸 प्रसिद्ध कवि-राजनीतिज्ञ कुमार विश्वास ने भी शंकराचार्य के साथ हुए कथित दुर्व्यवहार पर प्रतिक्रिया दी है।
🔸 समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि शंकराचार्य के प्रति हुए किसी भी प्रकार के अपमान ने सनातनियों के हृदय को चोट पहुँचाई है।
🔹 धार्मिक समाज की प्रतिक्रिया और समर्थन
साधु-संत समाज ने भी इस मुद्दे पर अभिव्यक्ति दी है। कई संतों ने शंकराचार्य के समर्थन में धार्मिक आयोजन किए, और कंप्यूटर बाबा जैसे वरिष्ठ साधु ने अग्नि कलश रखकर उनका समर्थन किया।
दूसरी ओर, कुछ विवादास्पद बयान देने के कारण ममता कुलकर्णी को किन्नर अखाड़े से निष्कासित भी किया गया, जो इस मुद्दे की सामाजिक जटिलताओं को और बढ़ाता है।
🔹 प्रशासन का रुख और संतुलन की कोशिशें
उत्तर प्रदेश सरकार के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने संयम और संवाद की अपील करते हुए कहा है कि प्रशासन संतों के सम्मान में कोई कमी नहीं होने देगा और मामले का शांतिपूर्ण समाधान खोजा जाएगा।
सरकार का यह भी कहना है कि यह विवाद झगड़े से अधिक यह दर्शाता है कि धार्मिक भावनाओं और प्रशासनिक आदेशों के बीच संतुलन बनाए रखना कितना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
2026 के माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का विवाद एक धार्मिक, कानूनी, प्रशासनिक और सामाजिक मुद्दा बन चुका है। यह केवल एक मेले की घटना नहीं रह गया, बल्कि भारत में आस्था, धार्मिक पदों की पहचान और प्रशासनिक आदेशों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को सामने रखा है। जनता और संत समाज दोनों की भावनाएँ इसमें प्रभावी भूमिका निभा रही हैं, जिनके समाधान के लिए आगे भी संवाद और संवेदनशीलता की आवश्यकता है।
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