नैतिकता का पतन: समाज के लिए अभिशाप: नैतिकता किसी भी समाज की आत्मा होती है। यह वह अदृश्य आधार है जिस पर विश्वास, सहयोग, न्याय और मानवीय गरिमा का भवन खड़ा होता है। जब समाज में नैतिक मूल्यों का ह्रास होने लगता है, तब केवल व्यक्ति ही नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना, राजनीतिक व्यवस्था और आर्थिक तंत्र भी प्रभावित होने लगते हैं। आज के भौतिकवादी और प्रतिस्पर्धात्मक युग में नैतिकता का पतन एक गंभीर चुनौती बन चुका है, जिसे उचित ही समाज के लिए एक “अभिशाप” कहा जा सकता है।
नैतिकता
प्रगति के इस युग में समाज ने ऊँची इमारतें खड़ी कर ली हैं, तेज़ सड़कें बना ली हैं और तकनीक से दुनिया को मुट्ठी में समेट लिया है। पर एक प्रश्न बार‑बार मन में उठता है—क्या हमने इंसान को भी उतना ही ऊँचा और मजबूत बना लिया है? उत्तर अक्सर असहज करता है। भौतिक उपलब्धियों की चमक के पीछे नैतिक मूल्यों का क्षरण स्पष्ट दिखाई देता है। यही नैतिकता का पतन आज समाज के लिए सबसे बड़ा अभिशाप बन चुका है।नैतिकता केवल उपदेशों या पुस्तकों की विषयवस्तु नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन की रीढ़ है। ईमानदारी, कर्तव्यबोध, करुणा और न्याय जैसे मूल्य ही व्यक्ति को जिम्मेदार नागरिक बनाते हैं। जब ये कमजोर पड़ते हैं, तब कानून भी केवल भय का साधन बनकर रह जाता है और समाज भीतर से खोखला होने लगता है।राजनीति इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती है। सत्ता, जो सेवा का माध्यम होनी चाहिए थी, अब अनेक स्थानों पर स्वार्थ की सीढ़ी बन गई है। भ्रष्टाचार, अवसरवाद और नैतिक समझौतों ने जनविश्वास को गहरी चोट पहुँचाई है। जब नेतृत्व ही नैतिक दिशा खो दे, तो आम नागरिकों से आदर्श आचरण की अपेक्षा करना व्यर्थ प्रतीत होता है।
न विकास बचेगा, न समाज – अगर नैतिकता नहीं
अर्थव्यवस्था भी इसी प्रवृत्ति से अछूती नहीं रही। मुनाफा सर्वोच्च मूल्य बन गया है और मनुष्यता एक गौण तत्व। उपभोक्ता को भ्रमित करना, श्रमिकों का शोषण करना और प्रकृति को नुकसान पहुँचाना अब असामान्य नहीं रहा। विकास के आँकड़े बढ़ रहे हैं, पर सामाजिक संतुलन लगातार बिगड़ता जा रहा है।परिवार और शिक्षा, जो नैतिकता के प्राकृतिक संरक्षक माने जाते थे, वे भी दबाव में हैं। माता‑पिता बच्चों को सुविधाएँ तो दे पा रहे हैं, पर समय और संस्कार नहीं। शिक्षा संस्थान चरित्र निर्माण से अधिक रोजगार की तैयारी पर केंद्रित हो गए हैं। परिणामस्वरूप समाज को कुशल पेशेवर तो मिल रहे हैं, पर संवेदनशील मनुष्य कम होते जा रहे हैं। मीडिया और सोशल मीडिया ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। सनसनी, विवाद और त्वरित लोकप्रियता की होड़ में मूल्य आधारित विमर्श हाशिये पर चला गया है। जब छल, आक्रामकता और दिखावे को सफलता का प्रतीक बना दिया जाए, तो युवाओं के लिए नैतिकता को महत्व देना स्वाभाविक रूप से कठिन हो जाता है।इस पतन के परिणाम हर दिन दिखाई देते हैं—बढ़ता अविश्वास, छोटी‑छोटी बातों पर हिंसा, रिश्तों में औपचारिकता और सार्वजनिक जीवन में असहिष्णुता। समाज लोगों का समूह भर रह जाता है, समुदाय नहीं।कुछ लोग इसे आधुनिकता की कीमत मानते हैं, पर यह तर्क अधूरा है। परिस्थितियाँ बदल सकती हैं, पर मानव गरिमा, ईमानदारी और उत्तरदायित्व जैसे मूल्य कभी पुराने नहीं पड़ते। तकनीक हमें तेज़ बना सकती है, पर नैतिकता ही हमें मानव बनाती है।समाधान किसी एक संस्था में नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना में है। सरकार को पारदर्शी और जवाबदेह बनना होगा, शिक्षा को फिर से मूल्य‑आधारित करना होगा, मीडिया को सामाजिक जिम्मेदारी निभानी होगी और परिवारों को संस्कारों की भूमिका फिर से अपनानी होगी। पर इन सबसे पहले, हर व्यक्ति को स्वयं से यह प्रश्न पूछना होगा—क्या मेरे आचरण से समाज बेहतर बन रहा है?नैतिकता का पुनर्जागरण बड़े नारों से नहीं, छोटे‑छोटे व्यवहारिक निर्णयों से होगा—ईमानदारी से काम करना, नियमों का पालन करना, कमजोर का साथ देना और असहमति को भी सम्मान देना।विकास की सच्ची पहचान ऊँची इमारतों में नहीं, ऊँचे चरित्र में होती है। यदि समाज को सचमुच प्रगति की राह पर ले जाना है, तो नैतिकता को फिर से केंद्र में लाना होगा। अन्यथा, सुविधाओं से भरा हुआ यह आधुनिक संसार भीतर से इतना रिक्त हो जाएगा कि उसे सभ्य समाज कहना भी केवल एक औपचारिकता रह जाएगी।