शिक्षा पर कब्ज़ा और मुक्ति की लड़ाई : जब शिक्षा भी शोषण की खेती बन जाए, तब सावित्रीबाई फुले को कैसे याद करें
जनवरी को भारत की पहली महिला शिक्षिका, इंक़लाबी कार्यकर्ता व कवियित्री सावित्रीबाई फुले जयंती है। वर्ष 1831 को महाराष्ट्र के नायगांव (सातारा ज़िला) में एक साधारण किसान परिवार में उनका जन्म हुआ। बाल्यावस्था में ही उनका विवाह महात्मा ज्योतिराव फुले से हुआ। ज्योतिराव फुले ने सावित्रीबाई को स्वयं पढ़ना-लिखना सिखाया। शिक्षा प्राप्त करने के बाद सावित्रीबाई फुले ने 1848 में पुणे के भिड़ेवाड़ा में लड़कियों के लिए भारत का पहला स्कूल शुरू किया। उस समय स्त्रियों और दलितों की शिक्षा को पाप माना जाता था। सावित्रीबाई फुले को स्कूल जाते समय पत्थर, गोबर और गालियाँ झेलनी पड़ीं, लेकिन उन्होंने शिक्षा का रास्ता नहीं छोड़ा। वे अतिरिक्त साड़ी लेकर निकलती थीं, ताकि गंदी होने पर बदल सकें—यह उनके संघर्ष और संकल्प का प्रतीक है। उन्होंने केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि विधवा पुनर्विवाह, बाल विवाह विरोध, जाति-उन्मूलन और महिला गरिमा के लिए भी संघर्ष किया। विधवाओं के लिए उन्होंने प्रसूति गृह (बाल हत्या रोकने हेतु) स्थापित किया, अपना बच्चा जनने के बजाय एक विधवा ब्राह्मणी के बच्चे को खुद गोद लिया जो अपने समय में एक साहसी इंक़लाबी कदम थे।
शिक्षा, स्त्री और संघर्ष: सावित्रीबाई फुले के रास्ते,आज की ज़रूरत
किसान जानता है कि जब ज़मीन पर कब्ज़ा हो जाए,मजदूर जानता है कि जब मेहनत की कीमत लूट ली जाए,और दलित बहुजन जानता है कि जब पढ़ने-लिखने व जल,जंग व जमीन का हक छीना जाए—तो वहां विनती नहीं, संघर्ष जन्म लेता है।आज यही हालत शिक्षा की है। शिक्षा अब ज्ञान का खेत नहीं रही,यह शासक और शोषक वर्ग के सुपर प्राफिट कमाने की फैक्ट्री बनती जा रही है।यह बच्चों को सवाल करना नहीं सिखा रही,बल्कि उन्हें जी-हजूरी और चापलूसी करने वाला लाचार गुलाम बना रही है। शिक्षा का निजीकरण एक नई ज़मींदारी व्यवस्था को जन्म दे रही है। जैसे पहले ज़मींदार खेत पर कब्ज़ा करता था,आज कॉरपोरेट और निजी संस्थान दिमाग़ पर कब्ज़ा कर रहे हैं। मोबाईल के विज्ञापन प्रचार से हमारी-आपकी जरुरत, पसंद और खरीददारी तय होने लगीं हैं। अधिकांश सरकारी स्कूल खंडहर बनते जा रहे हैं,सरकारी कॉलेज दम तोड़ रहे हैं, आनलाईन शिक्षा, दूरस्थ शिक्षा छा चुका है और मुनाफा बढ़ाने के लिए निजी शिक्षा की दुकानें कुकुरमुत्ते की तरह गली-गली में उग रही हैं।समान पाठ्यक्रम के बाद भी सबके मुनाफा आधारित अलग-अलग पब्लिकेशन की किताबें हैं,जूता,टाई,कोट,बेल्ट, आइडेंटिटी कार्ड सब क्रूर धंधे के अंग हैं। खूब पढ़ने के बाद रोजगार की कोई गारंटी नहीं, नौकरी पाने के लिए मंहगे फार्म और सैकड़ों किलोमीटर दूर परीक्षाएं , उसके बाद भी पेपर लीक,परीक्षाएं रद्द…!शिक्षा के जरिए भी मेहनतकश भारत के भविष्य , आपके बेटे-बेटियों को खेती-किसानी, रसोई , फैक्ट्रीयों के छोटे-छोटे अपार्टमेंट में,बिलींकिट, अमेज़न, फ्लिपकार्ट के भर बोरा ठूंस कर घर-घर प्राडक्ट पहुंचाने वाले सस्ते-श्रम में तब्दील किया जा रहा है।इसे नीति मत कहिए—यह सोची-समझी साजिश है। प्रगतिशीलता व वैज्ञानिक नजरिये पर हमला करते हुए गुलामी को संस्कार के रूप में परोसा जा रहा है।आज शिक्षा में तर्क की जगह ढ़ोग-पाखंड,अंधविश्वास, मिथक और महिमामंडन को ठूंसा जा रहा है।जो छात्र सवाल करता है,उसे बदतमीज़ , संस्कारविहिन बताया जा रहा है।जो छात्रा अन्याय पर बोलती है,उसे चरित्र पर हमला झेलना पड़ता है।ऐसी शिक्षा को हम कब तक बर्दाश्त करते रहेंगे जो कहती है— “सब ठीक है, सहो, व्यवस्था मत बदलो।” सावित्रीबाई फुले ने ऐसी शिक्षा ठुकराई थी।सावित्रीबाई फुले ने कभी नहीं कहा— “धीरे-धीरे समाज सुधरेगा।”उन्होंने साफ कहा— जब व्यवस्था अन्यायी हो तो इसे ललकारो।जब समाज ने कहा—“स्त्री पढ़ेगी तो बिगड़ जाएगी,”तो उन्होंने स्कूल खोल दिया।जब समाज ने कहा—“विधवा गर्भ पाप है,”तो उन्होंने प्रसूति-गृह खोल दिया।उन्होंने—अनुमति नहीं माँगी, स्कूल खोला।उन पर गन्दे किचड़, पत्थर फेंकें,गालियाँ दी गई लेकिन सब कुछ सहकर चुप बैठी नहीं रहीं, पढ़ाना जारी रखीं। सोचिए,मनुवादी सामंतवाद के अंधपरम्पराओं, रुढ़ियों के खिलाफ बलत्कृत विधवाओं को उपदेश नहीं दिए, प्रसूति गृह खोलने व चलाने का खतरा उठाईं। जगह संगठन भी बनाई।यही वास्तव में मेहनतकश मजदूर, किसान, दलित बहुजनों के आंदोलन की भाषा है— व्यवहार के साथ सिध्दान्त और सिध्दांत के साथ व्यवहार को मिला देना। यानी कथनी-करनी एक करना ।
शिक्षा पर कब्ज़ा और मुक्ति की लड़ाई: सावित्रीबाई फुले की बाग़ी विरासत
तब हम आज क्या करें?क्या हम सिर्फ सुधार की भीख माँगते रहेंगे? ऐसे दौर में जब— अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले शानदार, ईमानदार लोगों को जेल और बलात्कारियों, अपराधियों को बेल मिलती है,गिरोह बंद दरिंदों के रिहाई पर माला पहनाई जाती है, मिठाईयां बांटी जाती हैं।शिक्षा महंगी होती जाती है,गरीब मेहनतकश भारत की बेटियाँ असुरक्षित रहती हैं तो यह मानना कि “समाज धीरे-धीरे सुधरेगा”—यह भाषा शासक वर्ग की सबसे बड़ी चाल है। इतिहास गवाह है कि किसान ने तीन काले कानूनों को सुधार से नहीं, व्यापक आंदोलन से रोका था।मजदूर ने आठ घंटे का काम अनुरोध से नहीं, संघर्ष व शहादत से पाया था।
ज्ञान का खेत या मुनाफ़े की फैक्ट्री? सावित्रीबाई फुले और आज की शिक्षा
तो शिक्षा और स्त्री मुक्ति सिर्फ भाषण से कैसे मिलेगी?अब रास्ता साफ है या तो— आप,हम शिक्षा को बाजार के हवाले कर दें,बेटियों को डर के हवाले करके महिलाविरोधी पितृसत्तात्मक नीति चलने दें और मेहनतकश दलित बहुजन समाज को चुप्पी व आत्मसमर्पण के हवाले कर दें।या फिर— सावित्रीबाई फुले का रास्ता अपनाएँ।संघर्ष का रास्ता।तर्क व सवाल का रास्ता।टकराव का रास्ता।क्योंकि जब शिक्षा भी खर-पतवार रुपी शोषण की बंजर खेती बन जाए,तब सुधार नहीं— रोटावेटर रूपी इंक़लाबी संघर्ष ही असली फसल वाली खेती तैयार करती है। आगे भारतीय समाज में जगह-जगह सावित्रीबाई फुले की बागी विरासत के बीज बिखेर दीजिए । मेहनतकशों की फसल लहलहा उठेगी । Readmore……
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