अमेरिका की विदेश नीति और मुस्लिम देशों में अस्थिरता, विशेष रिपोर्ट: अमेरिका की विदेश नीति पर गंभीर सवाल। इराक, अफगानिस्तान, सीरिया, लीबिया जैसे देशों में युद्ध और अस्थिरता के पीछे क्या है सच्चाई? पूरी रिपोर्ट पढ़ें।
अमेरिकी विदेश नीति पर फिर उठे सवाल, मुस्लिम देशों में अस्थिरता को लेकर तीखी बहस
अंतरराष्ट्रीय मंचों और सामाजिक-राजनीतिक हलकों में एक बार फिर अमेरिका की विदेश नीति को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है। कई विश्लेषकों, मानवाधिकार संगठनों और राजनीतिक टिप्पणीकारों का कहना है कि बीते दो दशकों में अमेरिका के सैन्य हस्तक्षेपों ने मध्य-पूर्व और आसपास के कई देशों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
आलोचकों के अनुसार इराक, अफगानिस्तान, सीरिया, लीबिया और लेबनान जैसे देशों में हुए युद्धों और सैन्य कार्रवाइयों से वहां की बुनियादी संरचनाएं नष्ट हुईं, लाखों लोग विस्थापित हुए और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी। इराक युद्ध (2003) के बाद से देश में लगातार संघर्ष, आतंकवाद और कमजोर शासन व्यवस्था देखने को मिली। वहीं अफगानिस्तान में लगभग 20 वर्षों तक चले युद्ध के बाद भी स्थायी शांति स्थापित नहीं हो सकी।
सीरिया में गृहयुद्ध के दौरान अमेरिकी हस्तक्षेप और विभिन्न गुटों को समर्थन देने के आरोप लगते रहे हैं, जबकि लीबिया में नाटो अभियान के बाद सत्ता का संतुलन बिगड़ गया और देश आज भी कई हिस्सों में बंटा हुआ है। लेबनान में भी क्षेत्रीय संघर्षों का असर उसकी अर्थव्यवस्था और राजनीति पर पड़ा है।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इन हस्तक्षेपों के पीछे ऊर्जा संसाधनों, विशेषकर तेल और गैस पर नियंत्रण जैसे रणनीतिक हित भी एक बड़ा कारण रहे हैं। उनका तर्क है कि मुस्लिम बहुल देशों में फैली अस्थिरता केवल आंतरिक कारणों से नहीं, बल्कि बाहरी शक्तियों की नीतियों से भी जुड़ी हुई है।
हालांकि अमेरिका इन आरोपों को खारिज करता रहा है। अमेरिकी सरकार का कहना है कि उसके सैन्य अभियान आतंकवाद से लड़ने, लोकतंत्र को बढ़ावा देने और वैश्विक सुरक्षा बनाए रखने के उद्देश्य से किए गए। अमेरिका समर्थक विश्लेषक यह भी तर्क देते हैं कि कई देशों की समस्याओं की जड़ें स्थानीय राजनीतिक विफलताओं, तानाशाही शासन और जातीय-धार्मिक संघर्षों में हैं।
फिर भी, दुनिया के कई हिस्सों में यह धारणा मजबूत हो रही है कि लगातार होने वाले सैन्य हस्तक्षेपों से शांति के बजाय अस्थिरता बढ़ी है। इसी कारण कुछ वर्ग अमेरिका को वैश्विक शांति के लिए चुनौती के रूप में देखते हैं।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अब यह बहस तेज हो रही है कि क्या सैन्य ताकत के ज़रिये स्थिरता लाई जा सकती है, या फिर कूटनीति, विकास और संवाद ही दीर्घकालिक समाधान का रास्ता हैं।